अदब की हद में हूं

मैं बेअदब नहीं होता।

तुम्हारा दीदार अब हमे

रोज़ रोज नहीं होता।

कभी-कभी तो छलक पड़ती हैं

यूं ये प्यारी सी आंखें मेरी,

उदास होने का कोई

सबब नहीं होता।

कई अमीरों की हालात

न पूछ कि बस,

ग़रीब होने का एहसास

अब हमे नहीं होता।

मैं वुजुर्गो को अब

ये बात कैसे समझाउं,

मोहब्बतों में अब

पहले सी बाते नहीं होती।

वहां के लोग

बड़े दिलफरेब होते हैं,

मेरा बहकना भी कोई

अजब नहीं होता।

मैं इस ज़मीन का दीदार

करना आज चाहता हूं,

जहां कभी भी

खुदा का ग़ज़ब नहीं होता।