गुलें आज इतनी खुस्बुदार कैसे हैं,

अंधेरी रातें भी इतनी चमकदार कैसे हैं,

अब तो मैं तेरा शहर छोड़ आया हूं,

फिर तेरी आँखें इतनी नम-दार कैसे हैं।

तुम मेरे हो, मेरे ही रहोगे, ये मैं जानत हूं,

मगर तेरे दरवाज़े ये चौकीदार कैसे हैं।

सालों बीता दिया मैंने तेरे इंतज़ार में,

फिर भी मेरा दिल तेरे लिए, आज भी इतना वफ़ादार कैसे हैं।


~सुमित कुमार