बादलों के पीछे छुपते चांद से,मुझे इतना लगाव क्यों हैं।बिन मौसम बरसात से,मुझे इतना ऐतबार क्यों हैं।वो तो मेरी लकीरों में भी नहीं,फिर भी मुझे उससे इतना प्यार क्यों हैं।
बादलों के पीछे छुपते चांद से,मुझे इतना लगाव क्यों हैं।
बिन मौसम बरसात से,मुझे इतना ऐतबार क्यों हैं।
वो तो मेरी लकीरों में भी नहीं,फिर भी मुझे उससे इतना प्यार क्यों हैं।