हाँ, मैं तुझसे मोह्बत करता हूँ ,
पर कभी बताया जो नहीं।
अंदर ही अंदर घुटता रहा,
पर कभी जताया जो नहीं।
सोचता हूँ रख दूँ अब अपनी दिल की सारी हसरते ,
पर तुमने कभी कोई इशारा किया जो नहीं।
ये सिलसिला कब तक चलेगा वो तो खुदा ही जाने ,
जिसने अभी तक हमे मिलवाया जो नहीं।
खत्म करना चाहता हूँ ये बेनाम रिस्ता ,
मगर ये दिल हैं अपना मानता जो नहीं।
कैसे दिखेगी तुम्हें हमारी मोह्बत ,
तुमने भी तो कभी अपने आँखों से पट्टी हटाया जो नहीं।
~सुमित कुमार


