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एक ऐसी


एक ऐसी डोर थी हमारी,जिसका कोई छोर नहीं।

बेपनाह मोहब्बत किया मैंने,जिसका कोई तोड़ नहीं।

मिशालाएं बन चुकी थी मोहब्बत हमारी,मगर अब बाज़ार में इसका कोई शोर नहीं।

खुदा के लिए जीना तो सीख लिया मैंने,मगर मरना तेरे बगैर नहीं।

— सुमित कुमार
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