फ़ासला
दिन की साँसें
टूटतीं थीं
पर
शाम के आने में
अभी वक़्त था:
सब्र का ये
इम्तिहान
ज़रा सख़्त था...
उम्मीद के
नाज़ुक पुलों से
बाँधते रहे
दूरियाँ,
नज़दीकियों के
दरम्याँ वो
फ़ासला,
कमबख़्त था...


फ़ासला
दिन की साँसें
टूटतीं थीं
पर
शाम के आने में
अभी वक़्त था:
सब्र का ये
इम्तिहान
ज़रा सख़्त था...
उम्मीद के
नाज़ुक पुलों से
बाँधते रहे
दूरियाँ,
नज़दीकियों के
दरम्याँ वो
फ़ासला,
कमबख़्त था...