झूठ ने कहा है, झूठ न कहा जाय,

जितना भी कहा जाय, थोड़ा कम कहा जाय;

गर बंधती है उम्मीद, बचती हैं जानें

तो क्यों ना आज थोड़ा सच कहा जाय।


जाने से पहले कुछ केह रहा था वो हमसे

पर सुनने को उसे, कोई तैयार न था;

सब लीन थे अपने-अपने व्यापार में,

शायद तब कोई इतना बेज़ार न था।


तो लो अब मेरे-तुम्हारे, हर किसी के

दरवाज़े पर मुँह बाये खड़ा है;

रूह तो रुख़सत हो चली कभी की,

फ़र्श पर बस लिबास पड़ा है।


तुमने तो सहेज रख्खे थे अपने शेर,

सुनने वाला ही अब दुश्वार हो चला है;

केह दो दीवारों से ही, जो भी केहना है,

ये मौका भी किसे बार-बार मिला है।


फटक-झटक कर धूल को,

कुछ पुराने पन्नों को पलटाया जाय;

दुनिया तो बहोत देख ली होगी तुमने,

गुलाबों की ओर ज़रा रुख़ किया जाय।


झूठ ने कहा है, झूठ न कहा जाय,

जितना भी कहा जाय, थोड़ा कम कहा जाय;

गर बंधती है उम्मीद, बचती हैं जानें

तो क्यों ना आज थोड़ा सच कहा जाय।

                   ---- सुमीत कुमार