चलो अब बात करता हूँ बस चाँदनी की,
ज़िक्र जो किया दाग़ का, चाँद बुरा मान जाएगा।
चलो अब बात करता हूँ बस रोशनी की,
ज़िक्र जो किया जलन का, आफ़ताब बुरा मान जाएगा।
चलो अब बात करता हूँ बस उड़ान की,
ज़िक्र जो किया बादलों का, आसमाँ बुरा मान जाएगा।
चलो अब बात करता हूँ बस रंगों की,
ज़िक्र जो किया लहू का, घाव बुरा मान जाएगा।
चलो अब बात करता हूँ बस नज़्मों की,
ज़िक्र जो किया लफ़्ज़ों का, शायर बुरा मान जाएगा।
चलो अब बात करता हूँ बस मुस्कुराने की,
तनी जो लकीरें फ़िक्र की, चेहरा बुरा मान जाएगा।
चलो अब बस लोरियाँ ही गुनगुनाता हूँ,
सिसकियाँ गर जो छलक पड़ीं, वक़्त बुरा मान जाएगा।
----------- सुमीत कुमार


