मसला ही नहीं होता जो तुम मौसम सी नहीं बदलती
ओढ़ लेते हुम् भी तुम्हें कफन तक
गर लिबास बदलने की ज़रूरत नही होती
चाह के भी नसीब में न मिलती दो गज़ ज़मीन से ज्यादा
बस चैन होता कि मौत में भी तुम मेरे साथ होती
और हंसीन कम नहीं तुम्हारे बदले हुए तेवर भी
माफ करना, हमें गर्मी बर्दाश्त नही होति
भूल जाते हुम् भी फिर सर्दी की चोट को,
जो बारिश में भीगने की आदत पुरानी नही होती


