हसरतें थीं जो बयां करने को , वो इशारों में मैं कहता रहा

जो आता न कभी समझ तुम्हें , मैं वो भी कहानियाँ जीता रहा

तुम्हें हर रोज़ देखने के लिए ही, शायद मैं बी-टेक पढता रहा

विश्वास नहीं होता आईने में आज खुद को बदला हुआ देख कर

तुम संवरती होगी किसी और का आइना देख कर

मैं बस आईने में तुम्हारी तस्वीर देख संभलता गया


डिग्री भी जमा कर लीं मैंने, इस उम्मीद में के फिर तुमसे कुछ बात हो

फेसबुक स्टेटस देख एक दिन मालूम हुआ की,

तुम भूल जाने वाला बस एक ख्वाब हो


हसरतें थीं जो बयां करने को , वो इशारों में मैं कहता रहा

जो आता न कभी समझ तुम्हें , मैं वो भी कहानियाँ जीता रहा

तुम्हें हर रोज़ देखने के लिए ही, शायद मैं बी-टेक पढता रहा