नाम है मेरा, मगर मेरी पहचान नहीं
हाँ लोग जानते हैं मेरा पता, मगर मुझे मेरी हैसियत मालूम नहीं
नमक बन कर सन्न गया लहू मिटटी में
क़र्ज़ है तुम पर और तुमको कीमत मालूम नहीं !
मुद्दा बना कर मुझे जीती गयीं सियासत- ए- जंग कई
आज घर हुआ है मेरा वीरान तो किसी को फ़िक्र ही नहीं
ता उम्र गुज़री उम्मीद में , न मगर दिखी कोई किरण नयी
आज फिर हंगामा मौत पर , तो मक़बूल मेरी चिता ही सही


