सिर्फ वो है जो पहचानती है मुझे

 

किसी से गुफ़्तगू करती नहीं

 

एक मंज़िल दिखती है उसकी नज़रों में मुझे
वो कभी महसूस कराती नहीं

 

उस के अंदर दबी आँच दिख रही है मुझे

 

वो हर रोज़ उसकी तड़प छुपा रही है

 

जाने अब वो कैसे जी रही है

 

हाँ वो हर दिन अपनी आशा मार रही है

 

उसका कारन भी मैं हूँ

 

वो हर दिन एक सवाल छोड़ जा रही है

 

उसके जवाब भी मैं हूँ

 

बेपनाह मुहब्बत को भूले जा रही है

 

वो उसका बेइंतहां प्यार भी मैं हूँ

 

वो मलाल लफ़्ज़ों में बयाँ करना लुप्त हो चुका

 

वो मलाल इश्क़ भी मैं हूँ

 

मगर,
अब वो सवाल करती नहीं

 

वो किसी की परवाह करती नहीं

 

जाने अब वो कैसे जी रही है

 

-       अनुभव