मैं कृपा पात्र तुम कृपादीन 

कैसे हो सकता है मिलन प्राण 

तुम दाता मैं हूँ धूल मात्र 

तुम स्वयं प्रभू मैं तुच्छ जात 

मन चाहे तुझ में हूँ विलीन 

लेकिन कैसे मैं हूँ दीन हीन 

तुम सरगम मैं हूँ राग हीन 

तुम प्राण दान मैं हूँ प्राण हीन 

हो सकता कैसे राग अलाप 

कैसे यह  सह लूँ मैं आघात 

हे!नाथ शरण में आने दो

विचलित मन को समझाने दो 

दो मोक्ष मुझे कृतार्थ करो 

भव सागर से उध्दार करो ।