हर अँधेरी रात की एक सुबह होती है,

सूरज की नई किरण उम्मीदों के दीप जलाती है।

बारिश जो तपती धरती को शीतलता पहुँचाती है,

वही तूफ़ान बन अट्टहास कर कहर बरपाती है।

उठती-मचलती लहरें कितनी भी मनमोहक क्यों न हों,

कब विकराल रूप धर सब कुछ लील जाएँ, कौन जानता है।

ठंडी हवाएँ तपते रेगिस्तान में सुकून दे जाती हैं,

वही सर्दियों में रीढ़ तक कंपा जाती हैं।

यही तो समय का चक्र है—

कब, कहाँ और कैसे बदल जाए,

कोई समझ नहीं पाता।