आँख से गिरता आँसू तर्जनी पर रख

कहा था तुमने—

"मोती यूँ न बिखेरो,

मेरी जान से भी बढ़कर है कीमत इनकी।"

फिर मुस्कुराकर बोले थे—

"बहुत जल्द आऊँगा,

तेरी माँग सजाऊँगा।

आँसुओं से नहीं, मुस्कराहट से विदा कहना,

माँ के संग शगुन लेकर आऊँगा।"

दिन-रात

तुम्हारा भी इंतज़ार किया,

तुम्हारे शगुन का भी।

मगर

न तुम आए,

न तुम्हारा शगुन।

फिर एक दिन

अचानक सोशल मीडिया पर

लाल जोड़े में सजी दुल्हन के साथ,

शेरवानी पहने देखा तुम्हें।

दिल तो टूटा,

पर शुक्रिया उस फ़ेसबुक का—

जो मेरी प्रेमान्ध आँखें न देख सकीं,

उसने एक पल में दिखा दिया।

आज सोचती हूँ—

कहाँ खो गए वो दिन?

कहाँ खो गए तुम्हारे वे खोखले वादे,

जब

मेरे हर आँसू की बूँद

तुम्हें मोती नज़र आती थी ।

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