जो बीत गई सो बात गई ,

ये कैसे हो सकता है ?

जो बीत गई सो तो ठीक ,

वो बात गई कैसे है ठीक ?

बैठी है मन में बात गड़ी ,

जैसे कंचन में हीरामणि ।

मेरे मन में जो धँसती है ,

पल पल ही दिल में रिसती  है।

गहरी है मेरी चोट बड़ी ,

खाई हो जैसे गहरी बड़ी ।

न चोट मेरी ये हरती है ,

न खाई कभी ये भरती है ।

कितना सोचूँ ,मिट्टी डालूँ ,

 गई नुकीली यादों पर ।

लेकिन— 

लौट-लौट आती हैं फिर ,

कुरेदने मेरा अन्तर्मन ।

कोई राह नहीं ,

कोई थाह नही ।

कोई चाह नहीं ,

कोई मोह नही ।

कैसे हो उध्दार मेरा,

कैसे हो बेड़ा पार मेरा ……..