कैसे रोकूँ इस हृदय को
ले रहा अंगड़ाई है
बहते झरने उड़ते पंछी
मोरनी इठलाई है ।
हूक सी उठती हृदय में
मस्ती सी इक छाई है
कैसे रोकूँ इस हृदय को
ले रहा अंगड़ाई है ।
ले रही लहरें हिलोरें
चाँदनी जो छाई है ।
चाँद देख लहरें अनोखी
ले रही अंगड़ाई हैं
कैसे रोकूँ इस हृदय को
ले रहा अंगड़ाई है ।
सबने रोका सबने टोका
सबने दी दुहाई है
सबके कहते कब रूका है
करता जो मनआई है ।
कैसे रोकूँ इस हृदय को
ले रहा अंगड़ाई है ।
रोक लो यदि रोक सको तो
इस उमड़ती बाढ़ को,
वरना बह जाएगा सब कुछ
इस दिल की हर चाह को।
कैसे रोकूँ इस हृदय को—
ले रहा अंगड़ाई है…_______________________
