अलमारी में सबसे निचली तह में
एक लिफाफे में
कुछ काग़ज़ों को नही
एक अधूरे ख्वाब को
संभाल रखा था
एम ए की डिग्री
एम ए प्रथम वर्ष की
टापर मार्क शीट
और ख्वाबों का
अधूरा फ़ॉर्म
बुझा हुआ दिया —
जो कभी जल न सका
उन्हें छूते ही
वर्षों से बंद
एक साँझ खुल गई —
मैं फिर उस छज्जे
पर खड़ी थी
जहाँ हर सांझ
सामने मन्दिर के
जलते दियों की लौ
टिमटिमाते ख्वाब देखाती
और
उसकी लौ में
आने वाले दिनों में अपना चेहरा
पहचानने की कोशिश करती
विश्वास था
मेहनत की मिट्टी में
सफलता का पौधा लगेगा
लाल बत्ती की गाड़ी में
माँ, पिताजी को घुमाऊँगी
कॉम्पिटिशन मास्टर के
पन्ने फड़फड़ाते
और
कल्पना के घोड़े भागते
किताबें रातों की सहेली बनती
भोर का सूरज
अलसाई आँखों का
नूर बनता
बिट्टो …….
चौंक कर कहा —
आई माँ ……..
आते ही माँ ने हाथ में
एक लड़के की तस्वीर थमा दी
पहली बार जाना
परम्परा के शब्द,
निस्तब्ध होते हुए भी
बहुत कुछ कह जाते हैं
माँ……
मेरा फाइनल?
पहला ही रिश्ता है ,
कहाँ इतनी जल्दी
बात बनती है ?
किताब के पन्नें
मेरी किस्मत के साथ
हाथ में भिंच गए ,
उनमें लिखे
सपनों की स्याही
चुप-चाप ही सूख गई
मैं…..
एक ही नजर में
लड़के वालों को भा गई
खुशी और ठहाकों बीच
मेरी चुप्पी कहीं गुम हो गई
मेरे जीवन का नया
अध्याय लिखा जाने लगा
जिसमें मेरे लिखे पन्ने
अनुपस्थित थे
सास ने कहा ,
मन छोटा न करो
बेटा ,प्रगतिशील हैं
तुम्हारी राह का
रोड़ा नही ,
सहायक बनेगा
आज ,
अलमारी की सफाई
में मिला
अधूरा आवेदन-पत्र
एम ए की डिग्री
टापर मार्क शीट
उस दरवाजे को खोज रही थी
जिसकी चाबी मेरे ही
हाथ से कहीं
रखवा दी गई थी
और सफेद झूठ
लिफाफे के बाहर
झांक कर मुस्कुरा
रहा था