बादलों से घिरा आसमान,

उमस से भरी दुपहरी,

पसीने से तरबतर

वह बोझ उठाए चला जा रहा था।

मन में एक ही सपना था—

आज मज़दूरी मिलते ही

कुछ सामान ले जाऊँगा।

बहुत दिनों से माँ

पकोड़ों का स्वाद

कल्पना में ही चखती रही है।

आज उसे

असली पकोड़े खिलाऊँगा,

और ईश्वर का

शुक्राना करूँगा।

कल ही तो देखा था—

झोपड़ी के कोने में

उकड़ूँ बैठी माँ

हरी मिर्च कुतर रही थी।

धीरे से बोली—

"अरे... ई तो मिर्ची..."

फिर सिसकारी भरकर

पास रखा पानी पिया,

आँखें मूँदकर मुस्कुराई—

"तेज मिर्ची है...

पर सुवाद आ गयो।"

वह एकटक माँ को देखता रहा।

माँ ने जीभ से चटकारा लिया,

आँखें मिचमिचाईं,

मानो सचमुच

खट्टी-मीठी चटनी के साथ

गरम पकौड़ी खा रही हो।

उसने मन ही मन ठान लिया—

अब कल्पना नहीं,

असली स्वाद चखाऊँगा।

मज़दूरी के सौ रुपये

मुट्ठी में भींचे

वह किराने की दुकान पहुँचा ही था,

कि पीछे से आवाज़ आई—

"अरे किसना...

जल्दी आ...

अम्मा... गई..."

"कित... गई?"

उसकी मुट्ठी में दबा

सौ का नोट

और भी सिकुड़ गया।

धीरे-धीरे

पसीने और आँसुओं के बीच 

मसलता चला गया।

आज तेरहवीं पर

वह पंडित जी को

तीखी चटनी के साथ

गरम पकौड़ियाँ परोस रहा था।

शायद...

माँ तक

अब

असली स्वाद पहुँच जाए।