नीले अंबर पर लाली छाई 

पीली नारंगी लहरें  लाई

सांझ हुई ,विश्राम अरूण कर 

टिमटिम तारों ने समझाया 

हिचक रहा विश्राम डगर पर 

सोच रहा मुझसे ही प्रकाश है 

मुझे कहाँ विश्राम नजर है 

छाए गा अंधियार जगत में 

मैं जो चला विश्राम डगर में 

सोचो न जगत के प्रहरी 

चाँद पर है  तेरी छाया गहरी

 पूरी न सही थोड़ी ही सही

कुछ तो कमी करे गा पूरी ।

साझं ढली अब जाओ घर 

राह तके तेरी ऊषा प्यारी 

सुदूर देश में करती प्रतिक्षा

पूर्ण हो अब उसकी इच्छा 

विचलित है चकोर अनमन सा 

कैसे हो दीदार प्रियतम का 

लहरें बैठी शान्त गहन सी 

ले रही हिलोरें मंद-मंद सी 

नभ शोभित बोला आकर तब

सृष्टि नियम ने बाँधा सबको

हम कोई अलग नही है प्यारे 

 कल फिर आना ऊषा संग इसी द्वारे 

देना नवजीवन प्रभात को 

सोया था जो सारी रात को 

सोई थी ये दुनियाँ सारी

खग मृग वृंद और सब प्राणी 

नव ऊर्जा भर देना सब में 

भरना उनमें एक नई कहानी 

जागे फिर यह सृष्टि सुहानी 

देना सबको मधुरतम् वाणी ।