वो कहते हैं चिड़िया हूँ मैं !!
चिड़िया ,जिसका तय है दायरा
बेशक् उड़ाने भरो तुम ये हैं कहते ,
और पंखो पर मेरे लगाम है लगाते!!
चिड़िया
जिसके पन्ने भरे हैं हिदायतो से ,
पन्ने कुछ मुड़े कुछ फटे से!!
उड़ान जिसकी नपी हुई सी,
आवाज़ हैं उसकी दबी हुई सी!!
चिड़िया जिसके अनगिनत हैं ख्वाब ,
हैं पुरा आसमां नापने को बेताब !
हैं थोड़ी चुलबूली सी खुद मे मग्न वो
कुछ अधूरी कुछ है खुली किताब !!
जो ना जाने पिंजरे की भाषा ,
जो है कुछ नादान सी ,
चिड़िया जो खामोशी मे भी सुनती हर आवाज़ सी,
चिड़िया जिसके मन में चलती जंग हैं ,
फिर भी अंदाजो में दिखाती वो दबंग हैं!!
पर तोड़ेगी वो हर वो दायरा
जो थामे उसके पंखो को,
चिड़िया हैं फिर से उड़ने को तैयार
बस कोई रोक न ले उसे इस बार!!
