धन की चाह में हमने,
एक लक्ष्मी को पूजा, एक को जलाया है।
जिसने सींचा है सबको,
उस रक्त को अपवित्र अभिशापित माना है।
नौ दिन जिनकी पूजा की,
पुत्र हेतु उन कन्याओं का खून बहाया है।
कुरुक्षेत्र की इस भूमि पे,
न जाने कितनी द्रोपदियों को दफनाया है।
देवी को अपनाया हमने,
पर नारी को ठुकराया है।
सुकृति जैन


