आज फिर बस्ती मे वो बच्चा भूखा सो गया,
और यहाँ हर प्लेट मे , एक स्लाइस पिज़्ज़ा का फ़िर रह गया,
कई दिन से नल मे पानी नहीं आया वहाँ ,
और यहाँ मिनरल वाटर विसकी के लिए फ्रीज़र मे बर्फ़ बन गया ।
वहां जून की गर्मी मे हो रहा पसीने से तर बतर वो मज़दूर ,
यहाँ बीस डिग्री ऐसी मे जयपुरी लिहाफ़ निकल गया ,
मीलों चल रहा वो नंगे पाँव , तपते ज़मीन पर ,
और यहाँ लास्ट सीजन का ब्रांडेड शू आउट ऑफ़ फैशन हो गया ।
वहां छप्पर से टपक रहा बिस्तर पर पानी , बारिश का ,
यहाँ गरम चाय और पकोड़े का मौसम हो गया ,
यहाँ रोमांटिक सोंग आर. जे. सुना रहा बारिश का ,
वहाँ मिटटी का बर्तन मिटटी मे मिल गया ।
फटे शर्ट की पॉकेट से दिसम्बर की हवा सीने मे चूभ रही उसे ,
और यहाँ पार्टी मे फटा - पुराना जीन्स कुल हो गया,
मर गया काँप कर ठण्ड से, कोई फुटपाथ पे कल ,
आज ,यहाँ धरने मे जाने को डिज़ाइनर कुर्ता निकल गया ।
यहाँ जो है मालिक ,चार ए. सी. और पाँच कारों का ,
कल , वही इको फ्रेंडली होने का ज्ञान रिक्शेवालों को दे गया
कैसे मिलेगा भर पेट खाना इन गरीबों को,
इस डिस्कशन पर हैबिटैट मे लाखों का कॉन्टिनेंटल खाना बुफे मे सज गया ।
वहां वो लड़ रहा हर रोज़ , दो रोटी , आधा प्याज़ और नमक खा कर ,
यहाँ इम्पोर्टेड एप्पल खा कर भी सेहत बिगड़ गया ,
वहाँ लगा रहा वो रोज़ , वोट , राशन , पानी और मुन्सिपैलिटी की कतारों मे,
और यहाँ ड्राइंग रूम मे बैठे - बैठे सभी समस्याओं का फैसला हो गया ।
यहाँ जो लिख रहा था अखबारों मे, रोज़ वीमेन राइट्स पर ,
सुना है कल उसी एडिटर पर सेक्शन थ्री सेवेंटी फाइव लग गया ,
आज फिर बस्ती मे वो बच्चा भूखा सो गया,
और यहाँ हर प्लेट मे , एक स्लाइस पिज़्ज़ा का फ़िर रह गया ।
- सुजीत झा