हे रक्तदेव!

आज भी प्रसन्न नही हो तुम।

सारा संसार है नतमस्तक आज

किसी के भी सिर पर पैर रख 

नाप सकते हो पूरी पृथ्वी।

किसी को भी बना के रावण या कंस

सन्तुष्ट कर सकते हो अपने अभिमान को

हे रक्तदेव!आज तुम ही राम हो और तुम ही कृष्ण।

तुम्हारे रक्त लगे नुकीले नाखून

आज भी चीर सकते हैं 

तुम्हारे विरोधी हिरण्यकश्यप का सीना।

हे नाशदेवता डर रहे हैं आज हम तुम्हारे विरोधी

तुमसे ज्यादा तुम्हारे अनुयायियों से।

पर मुझे काफ़िर कहने वाला मेरा दोस्त

जिसे आज ही घोषित किया गया है तुम्हारा दुश्मन,

जो नही रखवाना चाहते तुम्हारा पैर

अपने सिर पर,

वह मांस खाने वाले मेरे पड़ोसी

जो तुम्हें अच्छे नही लगते।

वे नही मरना चाहते तुम्हारे अनुयायियों से

पर वो नही रखते तुम्हारी व्यस्तता का ख्याल

शायद तुम इसीलिए अप्रसन्न हो।

पर हे रक्तदेव, वह नही जानते

तुम्हारे नियम और तुम्हारी दयादृष्टि

तुमने दे रखा खुद से ज्यादा ताकत अपने अनुयायियों को।

इसीलिए मेरे दोस्त को,मेरे पड़ोसी और तुम्हारे विरोधियों को

अब मरना होगा।

क्योंकि तुम्हारे विरोध का मतलब है

सिर्फ मौत।