घर का सबसे बड़ा लड़का

बिगड़ा हुआ, नाकारा।

हमेशा बोलने वाला

अब किसी से बोलता नही

कि कही कोई गलत बात न निकल जाये।

आवारा लड़का,

अब किसी से मिलता नही

कि समाज के लोग गलत न समझे।

नालायक लड़का,

अब डरता है कही बैठने से

उसी समाज के डर से।

अब वह घुट कर जीता है,

उन संबोधनों के साथ 

जो समाज के डर से घर वालो ने उसे नवाज़ी है।

वही समाज के जो चौराहे पर बैठा 

चाय और बीड़ी की चुस्कियों के साथ

सबके चरित्र का वर्णन करता है।

वही समाज जो हर हाल में अपना वर्चस्व चाहता है

वह हर उस चीज को बदल देना चाहता है

जो उसके निकम्मेपन को उजागर करें।

पर हम बदलते हैं उसी निकम्मे समाज के डर से

और बदलते रहेंगें।

जब तक हम इस समाज से डरेंगे

तब तक घर का हर बड़ा लड़का,

बिगड़ा हुआ,नालायक और आवारा ही होगा।