सरस्वती शिशु विद्या मंदिर व सभी आदरणीय गुरु जनों को समर्पित 

कहते थे मेरे स्कूल को.....सरस्वती शिशु विद्या मंदिर

तब सोचती थी ये तो स्कुल है और मंदिर मंदिर 

फिर क्यूँ कहलाता ये विद्या मंदिर?

प्रातः लम्बी संस्कृत में प्रार्थना, फिर कक्षा में पहुँचने के बाद सुखासन में पांच बार ॐकार, तब पहली कक्षा का पाठ, फिर रिसेस में लम्बे भोजन मंत्र को ले दे कर बोलने वाली 6 साल की नन्ही सुजाता आंख मिचे टिफिन को छुप कर निहारती ........ मन ही मन सोचती ये स्कूल है के मंदिर???

संस्कृत पढ़ने में, हिंदी बोलने में हिचक होती थी, English की class में "The Wise King" बहुत भाती थी,

सो मन लगा, reading, writing even thinking in English कर आयी.........

कॉलेज की डिग्री में, public speaking व कार्यक्षेत्र में धाक जमायी........

पर उसके विशुद्ध भारतीय मन को उसकी विद्या मंदिर की भाषा ही भायी...उसकी काव्य शैली भी विशुद्ध हिंदी में ही निखर के आयी 

अब बड़ी सुजाता जान पायी, विश्व की सबसे प्राचीन व वैज्ञानिक भाषा संस्कृत अपनी मातृ हिंदी का नहीं कोई तोड़

थोड़ी समझ आयी के पुस्तक हैँ जागृत देवी देवतातो कम जाती वो मूर्ति वाले मंदिर और पढ़ती जाग्रत देव कर जोड़

मानती व पूजती केवल विद्या मंदिर

- उन्मुक्ता