अथाह सिंधु ये मनस पटल
जाने कितने डूबे व उबरे
सतह में लहर जैसे,
भावनाएं आये-जाएँ
और हम हों प्रसन्न, व्यथित
जैसी मनस स्थिति, हिचकोले खाएं
लहरों के नीचे रहते जल-चर जैसे
विचार धनात्मक-ऋणात्माक
सिंधु के गर्भ में छिपे सीपी व मोती जैसे
"आंनदमय कोश" मानव का वास्तविक - शुद्धतम रूप
जो न भावना न विचार बल्कि दर्शन मनु-स्वरुप
-उन्मुक्ता
(डॉ. सुजाता पाण्डेय)


