आशाओं की पिटारी खोलें, शिकायत बंद करें
पौधों को लहलाहते देख मुस्कुरायें
पंछीयों को चहचहाते देख खिलखिलायें
आओ प्रकृति माँ के नन्हें बच्चे बने
चलो फिर से जियें हम
इन नन्हें विहंगों से सीखे जीवटता
गरजते बादल- बरसते पानी में भी वो उड़ते
ना उनका घर -मकान न महीने भर का राशन
रोज किसी की बालकनी से सिर्फ पेट भर जुग जाते
ज्यादा दिखे तो दूसरे पंछीओं को बुला आते
आपसी प्रेम और सहजीविता का पाठ पढ़ाते
इनसे कुछ सीखें हम
आओ प्रकृति माँ के नन्हें बच्चे बनें हम
चलो फिर से जियें हम
-उन्मुक्ता


