जब कभी अकेले में,

बेवजह मुस्कुराने से,

खुद के वजूद का एहसास हो जाता है,

तब ये अकेलापन भी बहुत सुकून दे जाता है।

वो एकांत भी कितना खूब होता है,

जहाँ पनपते है ख्वाब हजारों नित नव गुल खिलते हैं।

ख्वाहिश नही है चाँद को हासिल करने की,

बस पैरों तले जमीं का हिस्सा हो,

और अपने इन हौसलों में एक बाज की उड़ान हो।कोई सुनता है या नही इसकी कोई शिकायत नही है,

बेजुबां ये कलम हमारी खुद ही सुना देती है,

निर्जीव सा ये मन हमारा तब सजीव हो जाता है,

जब कोरे पन्ने पर हर वो नया शब्द हमारा,

अपना आकार खुद बना जाता हैं।

©️®️सुहानी