जल रही वो चिता नही ये मानव की काया है,

मिट्टी की बनी वो माया है,जीवन की व्यथाओं का उचाट है,

ये वही मणिकर्णिका घाट है!!


इच्छाएँ चिता में जलती है,यही दीप्त आत्मा सोती है,

सौभाग्य जिसका होता है,वो मानव काशी आता है,

जो अविरल धारा बहती है,मानव के पापों को धोती है,


इच्छा ये हर एक मनुज करें,मृत्यु को यहीं वो प्राप्त करें,

घाटों के किनारे पड़ी हुई हो,उन राखों का ढेर बने,

कैवल्य प्रभंजन बहकर ,जो अस्तित्व अमर कर जाती है,

वृंद भस्म के लाख सजे है,जैसे सृत्वा का ललाट है,

ये वही मणिकर्णिका घाट है!!

©️®️सुहानी