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वियोग


वियोग की पीड़ा से परिचित,नहीं फेंकते,

बहती नदी में कंकड़,उन्हें भय होता है,

नदी, कहीं, ठहर न जाए,सागर, प्रतीक्षा कर रहा होगा!

— सुधांशु रघुवंशी
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