वो एक इंसाँ नहीं, एक रिवाज़ थे पूरे,

अपने में समेटे वो एक संस्थान थे पूरे।


उनके जबां से निकली हर बात सच्ची थी,

दिल में उनके भी कोई बात खटकी थी।


कोई इतने बरस बाद भी उनका दीवाना नहीं होता,

क़ाबिलियत ना होती तो ये आशियाना नहीं होता।


सुनकर जिन ग़ज़लों को हम मुस्कुराते थे कभी,

रोएँगे सुनकर उन्हीं ग़ज़लों को ना सोचे थे कभी।


एक मुराद अधूरी रह गयी है दिल में मेरे भी,

आपसे मिलने की चाहत थी दिल में मेरे भी।


गर कोई पूछेगा मुझसे अंदाज़ मेरी ग़ज़लों का,

दूँगा संग्रह उसको राहत इंदौरी के ग़ज़लों का।