मैं कुछ सपनों को पूरा करने
खुद का खुद से स्पर्धा करने
प्रतिभा को अब जीवंत करने
उठा बैग मैं निकल आया हूँ,
मैं घर छोड़ आया हूँ।
इस अंजानी सी दुनिया में
दौड़ लगाते इस भगदड़ में
पथ पर चलते इन गैरों में
अपनों को ढूँढता आया हूँ,
मैं घर छोड़ आया हूँ।
इक छत की ख़ातिर थे भटके
इधर उधर जब हम थे अटके
सहने को हर तरह के झटके
घर का आँगन त्याग आया हूँ
मैं घर छोड़ आया हूँ।
हमें भूख लगे ना प्यास लगे
माँ की सुध दिन-रात लगे
दिल पर गर कोई बात लगे
माँ की याद में रोता आया हूँ
मैं घर छोड़ आया हूँ।
पैसों की क़ीमत कभी न समझे
हम उड़ते थे बिना सोचे समझे
तंगी से हुआ सामना तो समझे
पिता के बलिदान पर आया हूँ
मैं घर छोड़ आया हूँ।
घर से दूर हो कर भी पास हूँ मैं
अपनों के दिलों का ख़ास हूँ मैं
कुटुंब के सपनों का आस हूँ मैं
टूटी उम्मीदों को जगा आया हूँ
मैं घर छोड़ आया हूँ।
मैं कुछ सपनों को पूरा करने
खुद का खुद से स्पर्धा करने
प्रतिभा को अब जीवंत करने
उठा बैग मैं निकल आया हूँ,
मैं घर छोड़ आया हूँ।


