
जूझने दे तू मुझे इस रणभूमि में
जीत के मैं आऊँगा या सीख के,
हार तो मैं सकता नहीं अब यहाँ
इतिहास रच जाऊँगा या हो के।
बलिदान देना कुछ भी नया नहीं
ये मेरे मातृभूमि की परंपरा मात्र,
अश्फ़ाक की जन्म भूमि भी यही
लिखा यहीं भगत सिंह का पात्र।
बच्चा-बच्चा बूढ़ा-बूढ़ा हर कोई
देता कण-कण अपने जीवन का,
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