जूझने दे तू मुझे इस रणभूमि में

जीत के मैं आऊँगा या सीख के,

हार तो मैं सकता नहीं अब यहाँ 

इतिहास रच जाऊँगा या हो के।


बलिदान देना कुछ भी नया नहीं 

ये मेरे मातृभूमि की परंपरा मात्र,

अश्फ़ाक की जन्म भूमि भी यही

लिखा यहीं भगत सिंह का पात्र।


बच्चा-बच्चा बूढ़ा-बूढ़ा हर कोई

देता कण-कण अपने जीवन का,

जब आँच है आती भारत माँ पर

देश की नारी लेती रूप चंडी का।


जीवन मिला जो मुझको यहाँ पर

ये मेरे पुण्य प्रताप की कहानी है,

देशहित की ख़ातिर मर मिटने को

तैयार अब ये मेरी पूरी जवानी है।


स्वर्णिम अक्षरों में लिक्खा जाएगा

विश्व पटल पर जब देश का नाम,

हों मौजूद हम वहाँ पर सीना ताने

करना है जगत में कुछ ऐसा काम।