इश्क़ प्रेम लगाव अपनापन, सब बहकावा है,

जहां इंसानियत ना हो, वहाँ सब दिखावा है।


पैसों से ख़रीदे जा सकते हैं यहाँ लोग अनेक,

लेकिन ज़र से बने रिश्तों में सिर्फ़ छलावा है।


जिसको समझे हो तुम फ़क़ीर घमंड के आगे,

जाओ देखो उसके यहाँ भी दो-दो पज़ावा है।


मदिरा के नशे में चूर रहते हो जो तुम दिन भर,

वो और कुछ नहीं बस यमराज को चढ़ावा है।


सरग़ना बने फिरते हो तुम जिन मजलिसों का,

वहाँ आज भी सबसे जियादा हमारा बुलावा है।