तुम कहते हो कुछ लिख दो।

तो मैंने लिख दिया है।

मैंने जिस्म को पवित्र स्थल।

रूह को सुकून नाम दिया है।

दिमाग मेरा चमत्कारी ईश्वर का वरदान।

दिल को एक नाजुक सा नाम दिया है ।

मासूमियत इसको पहचान दिया है।

मन को बनारस का घाट कह दिया है।

जिस्म को चिता की राख कह दिया।।

तुम कहते हो कुछ लिख दो।

तो मैंने लिख दिया है।

मैंने जिस्म को मिट्टी।

रुहो आसमान की व सुंदर किरण कह दिया है।

मन को किसी चमत्कारी अविष्कार।

और बुद्धि को ज्ञान का भंडार कह दिया है।

लो मैंने जिस्म को एक नाम दिया है।

उसे सिर्फ एक श्मशान दिया है।

रूह को दफना पाए ऐसा कोई शमशान नहीं।

रूह को कोई कैद कर पाए ऐसा कोई धनवान नहीं।

इतना कोई महान नहीं।

लो मैंने लिख दिया है।

तुम पढ़ लेना।

जिस्मों के चक्कर में तुम रूह को ना गवा देना।

लिख दिया है मैंने तुम पढ़ लेना।



अमृत की एक बूंद~sudha