सुना है लोगो का मिलना इतेफाक़ नही होता दो अंजान मिलते है, कहीं किसी मोड़ पर, अपना सा खुद को ढूंढते है एक दूसरे में आदतें, चाहते, बातें जैसे सब मिलने लगता है लगता है जैसे ऐसे ही किसी का इंतेज़ार था सदियों से... बुनते है रिश्तों का एक झालर, सजाते है प्यार और विश्वास से.. गढ़ते है, एक ऐसा रिश्ता जो दुनिया से परे हो, माकूल, मुकम्मल सा.. वक़्त के साथ बहता तो है, पर एक पड़ाव पर आके ठहर जाता है.. सुना है, रिश्तों की भी उम्र होती है.. एक सफर होता है, पनपता है, जीता है.. फिर फ़ना होने का इंतेज़ार करता है।। -सुदेशना