ये सियासत हमें सिखाती है लड़ना पर
इनके झंडे तक एक हीं दुकान से आते हैं
जम्हूरियत से मजाक तो हमीं करते हैं
इनके डंडे तक हमारे हीं मकान से आते हैं
सेंकते हैं हाथ और जिस्म सुनहरी आग पर
इनके कंडे तक हमारे ही श्मशान से आते हैं
दीवाली में दीप और ईद में सर पे टोपी
इनके हथकंडे तक होली और रमजान से आते हैं।