हरण युगों - युगों का दोष लगा हर युग के आंगन पर कभी सीता कभी चीर हरण कभी दामिनी - दामन पर। उस समय सभाएं मौन थी एक विध्वंस रचाने को एक अकेला खड़ा अडिग था घर भेदी कहलाने को। लंकापति रावण ने छुए सीता के ज्वालामयी कर राख हो गयी सारी लंका भस्म हुआ एक स्वर्ण नगर। रहे मौन द्वापर में सब श्रीकृष्ण ने नाद किया महाभारत ठन गया उसी क्षण सुयोधन ने जब उन्माद किया। कलयुग में लुटे जाते हैं हर पल होता एक चीर-हरण इस काल में भी तटस्थ रहेगा क्या नहीं उठेगा राधे-करण। उसके मौन का दुष्परिणाम कौन सी कुंती चुकाएगी इस बार बेटी या कुल वधू या स्वयं उतारी जाएगी। ना रहो मौन जग संभलो अब सब स्वयं का आह्वान करो तोड़ो बेड़ियाँ जड़ समाज की एकघ्नी का संधान करो।। सुधीर प्रमिल


