जो लिखा है अभी अभी
पन्नों की स्याही वो सूखी नही
न जाने क्या लिखना है मुझे
कोई ख्याल अब तक रूकी ही नही।
अल्फाज़ो के इस दरिया में
मै डूब रहा हूँ आहिस्ता
न जाने क्या है वो चाहती
ये सवाल मुझे सुझी ही नही।
मै लिख रहा हूँ जैसे कोई कहानी
गर मिले हम तो उन्हें है सुनानी
पर ये मासूमियत की हद तो देखो
हमने सुनाया वो समझीं ही नही ।
शब्द खेल रहे हैं मुझसे
जज्बातो को जकड़ कर रखा है
मै ऐसा क्या लिखूं जो रूक जाए
दर्दों को ऐसी शब्द मिली ही नही।
कभी लिखते लिखते रूक जाता हूँ
जो लिखा उसे ना समझ पाता हूँ
मै क्यूं अक्सर इश्क लिख रहा
जो मुहब्बत मुझे मिली ही नही।
कभी दर्द कभी खुशी तो कभी बादल
भीग रहा है लफ्ज़ो से ये कोरा कागज़
लिखने को तो मैने लिख दी हर राज अपनी
पर ये इबारत किसी ने पढी ही नही।

