बादलों के ओट से
एक नन्हा सा बादल
जाने क्या कह गया
झम से पानी के कुछ बूंदें
फुहार सा बरसा गया।
आंखों को मींच बढ चला था
पर मेरे मन को पढ चला था।
संदेश कौन सी दे जाते हो
भाव कौन सी दिखला जाते हो?
बरसों से सवाल इक यह दबा था,
शायद वह कुछ भांप सा गया था।
हम भी उमडते हैं धुमडते हैं गरजते है
भाव सारे मन के कहाँ समभाल पाते हैं।
बरस जाते हैँ बूँद बनकर
भाव मेरे मुझसे फिसलकर।
सूना सूना रिक्त आसमां भरते हैं
हम भी भावनाओं को कहां समेट पाते है।
घड घड, घड घड हम भी ढोल बजाते हैं
ठन ठन, ठन ठन बिजली चमका शोर मचाते हैं,
हम भी भावनाओं को दिखला जाते हैं।
बरसों से बरसते आए हैं भाव कई जताए हैं
कह लो, सुन लो, कभी बरस भी जाओ
जीवन की बरसात में भीग भी जाओ
हम भी तो यही संदेश सुनाते आए हैं,
भाव यही हम भी तो दिखलाते आए हैं।
सुभाषिनी।।


