सड़को के पास उदास बैठी रहती है
खाली बैंचें
और फोन पर चलती उंगलिया रुकती नही ये यंहा
यंहा नही पूछता आजकल
कोई आगे का रास्ता
यंही बैठकर नही करता कोई वादे आने वाले कल के
इन्हें नही देता दिलासा की धूप लम्हों की मोहताज है
और छांव गोद मे तेरे करवट लेगी
बस बैठी रहती है उदास
उसी उम्मीद में की कोई छोटी सी कहानी
उसके दरमियान बड़ी होगी
किसी का इंतजार मुक्कमल होगा उसी के अस्तित्व पर
कोई छोड़ जाएगा छोड़ जाने वाली बातें
कोई साथ ले जाएगा साथ जाने वाली रातें
फिर बैठेगा कोई बरसात में भीगता हुआ
और पूछेगा धूप से उसके रिश्ते कैसे थे
और जैसे..
बस बैठे रहना ही
फकत बैठना नही होता
__ सुभाष यारों

