साथ बैठकर मसले कहाँ सुलझ पाते हैं।
वादा करते हैं लोग और मुकर जाते हैं।
लगता नहीं अब हैं बुजुर्ग मेरे गॉंव में ,
छोटी सी बात पर लोग झगड़ जाते हैं।
कैसे कह दूँ सावन को झूलों का मौसम ,
झूले पड़ें, ऐसे पेड़ कहाँ नजर आते हैं।
बेटी की विदाई पर सारा गॉंव रोता था,
जयमाल के बाद सब निकल जाते हैं।
आँख मूँदकर न करना भरोसा किसी पर,
नजर के हटते ही नजारे बदल जाते हैं।
सुभाष।


