मिटती है दुनिया जब न मिलती है रोटी
सुन लो जरा बहुत कुछ कहती है रोटी .
खून जिनका सड़क पर तुम बहा रहे हो,
उनके पसीने से सभी की बनती है रोटी .
तुमने किया है इंतजाम उनकी छीनने का,
देखना कैसे तुम्हारी भी छिनती है रोटी .
आग चूल्हे की ठंडी है जल रही चिमनियाँ ,
याद रखना मिलों में नहीं पकती है रोटी .
खुली सड़क पर जब ठण्ड से कांपते हैं वो ,
यहाँ तुम्हारी थाली में सुबकती है रोटी .
छोड़ दो अहंकार मन लो बात उनकी ,
हर रोज तुमसे यही तो कहती है रोटी .


