आओ कभी फुर्सत से
आओ कभी फुर्सत से खुद से मिलाऊँ
बैठी रहो सामने सब कुछ कह जाऊँ
जो बात है फकत अपने दरमियां
वो बात मैं दुनिया को क्यूँ बताऊं
वैसे तो मुझको जानती हो तुम
क्या पता उस दिन नया नजर आऊँ
साहिल पे बैठकर देखा है मौजों को तुमने
आओ किसी दिन समन्दर से मिलाऊँ
मेरे जज्बात तुम्हे लगते हैं किताबी
मैं उस किताब को हर्फ ब हर्फ़पढ़ाऊ
आओ कभी फुर्सत से खुद से मिलाऊँँ ़


