शीर्षक– "अस्थिर मन"
कभी समाजशास्त्र के पन्नों में दिखता है समाज के तानों की मार..
तो कभी अर्थशास्त्र में दिखता है किराया देने का भार।
कभी राजनीति पढ़ता हुं तो जाग जाते है अंदर के सारे पक्ष–विपक्ष...
तो कभी भूगोल के कंपन से और तीव्र हो जाता है ये द्विपक्ष..!
नैतिकता से नैतिक मूल्य भी कई सीख गया हूं ...
पर,
कला–संस्कृति पढ़ते वक्त याद आता है कि शायद, जीने की कला भूल गया हूं।
गणित की गणना आज दिनों को छोटा कर देने लगता है..
विज्ञान की क्रियाएं वाक् प्रतिक्रिया बनाने लगता है।
इतिहास में जाता हूं जब, खुद का इतिहास याद आ जाता है..
क्यों, मेरा इन किताबों से ऐसा रिश्ता बन जाता है..।
बहुत कुछ कर दिया इन किताबों के पीछे समर्पण..
फिर भी क्यों रहता है मेरा ये... "अस्थिर मन"।।
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