जिस घर में चलना सीखा था मैंनें,
उस दहलीज़ को छोड़के जाने से डर लगता है...
जिसने मुझे कभी दी थी जिंदगी,
उनसे दूर जाने से डर लगता है..
शादी दस्तूर है दुनिया का जानती हूँ मैं,
पर मां के आँचल को छोड़के जाने से डर लगता है..
जिसने उंगली पकड़ कर स्कूल छोड़ा
कमाने लायक बनाया,
मेरी कमाई पर हक उनका ही नहीं होगा यही सोच कर डर लगता है...
जिस आँगन में घर घर खेल कर बड़ी हुई,
उसी आँगन में पराया होने से डर लगता है..
जिस घर में चलना सीखा था मैंनें,
उस दहलीज़ को छोड़के जाने से डर लगता है...
~स्वेता


