जग बेगाना

मुझे तो ये जग बेगाना लगता है

जब ढूंढना चाहता हूँ सपने अपने

तब मुफ़लिस निराला लगता है


खाली परवाना सा लगता है

जब चाहता हूँ रंग बिखेरना कल्पना के

तब रंगीन ये जमाना लगता है

कभी बेनूर कभी सुहाना लगता है

देखना है मुझे अपने सपने बुनकर सौरभ

पर ये तो धुंधला जमाना लगता है

✒️सौरभ आर पी सैनी

   तारानगर