रात के ढ़लने में कुछ वक्त बाकी है,

सूरज के निकलने में कुछ वक्त बाकी है...... 

पूरा संसार अपने कमरों में खामोश पड़ा है

मेरी आंखों की नमी में पूरी रात जगी है 

यादों के जमघट की कतारें लगी हैं

आंसू के निकलने में कुछ वक्त बाकी है 

रात के ढ़लने में कुछ वक्त बाकी है,

सूरज के निकलने में कुछ वक्त बाकी है..... 


सुबह के निकलने से रात सो गई है 

परिंदों के घोंसलों में सुबह हो गई है 

चहचहाने से खामोशियां खो गई है 

उड़ने को तैयार हैं सभी दाने की खोज में 

दिन ढ़लने पर वापस लौट कर आयेंगे 

नन्हे बच्चों को कुछ लाकर खिलायेंगे

ठंडी हवाओं की शीतलता से उन्हें बचाना है

मां-बाप को अपना कर्तव्य भी निभाना है 

भविष्य को संवारने में कुछ वक्त बाकी है 

रात के ढ़लने में कुछ वक्त बाकी है,

सूरज के निकलने में कुछ वक्त बाकी है.... 


-----------------------------------© श्रीवास्तव_गौरव