प्रेम में प्रेयसी का अपने प्रेमी से अलग होना उसी प्रकार है जैसे फूल का अपने पौधे से अलग होना... फूल अलग होकर ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाता और यही स्थिति प्रेम में भी होती है..


साथ रहने पर कली से लेकर भविष्य के फूलों की सुगंधित मालाएं एक ही धागे में पिरोने की कल्पनाएं कभी-कभी एक ही निर्णय से समाप्त हो जाती है और अक्सर वह निर्णय प्रेमी या प्रेयसी के परिवार द्वारा लिये गये होते है।


अपरिपक्व अवस्था का प्रेम भी प्रेम ही होता है और वह प्रेम भी एक सुखमयी जीवन जीने का अधिकार चाहता है लेकिन इन सब में कोई शत्रु की भूमिका निभाता है तो वह है समाज....

समाज ऐसा होता है जो स्वयं के कार्यों को सही बताने के लिए अपने पक्ष में एक कुशल अधिवक्ता की तरह दलीलें पेश करता है परन्तु दूसरे के कार्यों में वह एक कुशल न्यायाधीश की भूमिका अदा करता है.... जिस दिन यह अपने और दूसरे का द्वन्द्व समाप्त हो जायेगा उसी दिन यह प्रदूषित सोच भी समाप्त हो जायेगी...


जो जैसे जीवन जीना चाहता है उसे वैसे ही जीवन जीने दे..



_ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ श्रीवास्तव गौरव